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अमिताभ बच्चन की सुपरहिट फिल्म की कहानी को धर्मेन्द्र ने इस रकम पर खरीदा था

‘इस इंडस्ट्री में ऐसे-वैसे लोग बन जाते हैं कैसे-कैसे

मुझे तो मैं भी न बनना आया, वैसा बनू तो कैसे…’
ऐसा हम नहीं, एक्टर धर्मेन्द्र कहते हैं. हाल ही में  धरम पाजी  एक लम्बा इंटरव्यू दिया. इस इंटरव्यू में धर्मेन्द्र ने अपने शायराना अंदाज़ में कई किस्से सुनाए. अपने करियर और बॉलीवुड के कई और एक्टर्स के बारे में खुलकर बात की. उनमें से सारी तो नहीं पर कुछ खास हम आपको बता देते हैं:
‘ज़ंजीर’ में काम करने से धर्मेन्द्र ने मना कर दिया था
धर्मेन्द्र ने बताया कि उन्होंने फिल्म ‘ज़ंजीर’ (1973) की स्टोरी सलीम खान से साढ़े सत्रह हज़ार रुपए में खरीदी थी. काफी समय तक वो उन्हीं के पास पड़ी रही. डायरेक्टर प्रकाश मेहरा ने धर्मेन्द्र के साथ फिल्म ‘समाधि’ बनाने के बाद ‘ज़ंजीर’ बनाने की इच्छा ज़ाहिर की. वो इस फिल्म के लिए बहुत उत्साहित थे. इसलिए धर्मेन्द्र ने मेहरा को कहानी दे दी. ये बात जब धर्मेन्द्र के कज़िन रंजीत विर्क (जिन्होंने फिल्म ‘क्रोधी’ बनाई थी) को पता चली तो धर्मेन्द्र की बहन ने उनको कसम में बांध दिया. ये कहकर कि आप मेहरा के साथ ये फिल्म नहीं करेंगे क्योंकि उन्होंने हमारे एक ऑफर को ठुकराया था.                                               
                               इस इमोशनल बंधन और घरवालों के दबाव में आकर धमेंद्र को फिल्म ‘ज़ंजीर’ छोड़नी पड़ी. जबकि डायरेक्टर प्रकाश मेहरा की पहली और आखिरी चॉइस धर्मेन्द्र ही थे. धर्मेन्द्र के इनकार करने के बाद प्रकाश मेहरा ने उस समय के बाकी फेमस हीरो जैसे दिलीप कुमार, राजकुमार और देवानंद को भी अप्रोच किया. लेकिन आखिर उन्हें अमिताभ को ही फाइनल करना पड़ा. ये एक रिस्क था. अमिताभ की तब तक सिर्फ एक फिल्म हिट रही थी आनंद. लेकिन आनंद की सफलता का श्रेय गया राजेश खन्ना को. अमिताभ की बाकी सारी फिल्में बमुश्किल औसत प्रदर्शन कर पाई थीं. फिल्म में धर्मेन्द्र की जगह अमिताभ आए तो एक और बड़ा बदलाव हुआ. पहले इस फिल्म में धर्मेन्द्र के साथ एक्ट्रेस मुमताज़ को कास्ट किया गया था. धर्मेन्द्र गए तो मुमताज़ की जगह भी जया भादुड़ी को कास्ट कर लिया गया.
शोले में जय वीरू की वजह से आया था 
ये वो बात है जो धर्मेन्द्र ने कभी सार्वजनिक रूप से नहीं कही. लेकिन इंटरव्यू में उन्होंने कहा,
”…लेकिन अब अमिताभ भी बोलते हैं तो मैं बता देता हूं कि हां, मेरे पास ऑफर आया. पूछा गया कि इस रोल के लिए किस एक्टर को ले कते हैं? तो मैंने अमित का नाम दे दिया. वैसे ये रोल शत्रुघ्न सिन्हा को जाने वाला था. शत्रुघ्न को जब पता चला तो वो मुझसे से बोले ”पाजी, ये क्या कर दिया?” तो मैंने कहा यार वो पहले आया तो मैंने कहा उसको दे दो.”
इस ‘पहले आया तो…’ को हम थोड़ी तफसील से आपको बताते हैं. अमिताभ उन दिनों स्ट्रगल कर रहे थे. तो वो बड़े स्टार्स से कहा करते थे कि यदि कोई रोल हो तो उन्हें याद कर लें. धर्मेन्द्र इसी की बात कर रहे हैं.                                                                                                                                                     

                                                                                                                                                                                                                                                                                                                               टैक्सी चलाकर गुज़ारा करने को तैयार थे धर्मेन्द्र

मुंबई आकर धर्मेन्द्र का पहला सपना था एक कार खरीदना. उनके पास पैसा आया तो उन्होंने कार खरीदी. पूरे 18,000 में. लेकिन ये सपना पूरा करते हुए भी उनके दिमाग में ये बात थी कि कहीं वो बतौर एक्टर असफल न हो जाएं. इसीलिए उन्होंने फिएट की कार ली. ये कार भरोसेमंद होती थी और इसीलिए बतौर टैक्सी बंबई की सड़कों पर चलती थी. तो धर्मेन्द्र की सोच ये थी कि अगर फिल्म इंडस्ट्री में न चले तो टैक्सी चलाकर पेट भरेंगे और उसके साथ स्ट्रगल करेंगे लेकिन मुंबई में कुछ बन कर रहेंगे.
जब धर्मेन्द्र ने बॉलीवुड की पहली मल्टी स्टारर फिल्म को करने से मन कर दिया
ये फिल्म थी ‘वक़्त’ (1965). यश चोपड़ा ने धर्मेन्द्र को फिल्म में तीन भाइयों में से सबसे बड़े का रोल दिया था. धर्मेन्द्र तब इंडस्ट्री में नए-नए छाए थे. तो धर्मेन्द्र ने यश साहब को मझले भाई (यानी फिल्म में जो किरदार सुनील दत्त ने किया था) का रोल मांगा और इसका रीज़न ये दिया कि अगर मैं बड़े भाई का रोल करूंगा तो मुझे बड़े भाई टाइप के रोल मिलने लग जाएंगे. मगर यश चोपड़ा धर्मेन्द्र टाल गए. तो धर्मेन्द्र बताते हैं फिर उन्होंने भी इस रोल को जाने दिया. ये रोल फिर राजकुमार ने किया.                                               
मनमोहन देसाई की फिल्म ‘अमर अकबर एन्थनी’ के बारे में बताते हुए धर्मेन्द्र ने कहा कि जब ये फिल्म देसाई मेरे पास लेकर आए थे तब मैं 16-20 घंटे काम कर रहा था. क्योंकि तब ‘धरम वीर’ और ‘चाचा भतीजा’ की शूटिंग हो रही थी. इसलिए मैंने उन्हें कहा कि ये वाली फिल्म आप किसी और के साथ बना लीजिए, मैं आपकी नेक्स्ट फिल्म करूंगा. ये सुनकर देसाई कुछ बोले तो नहीं मगर उनके ईगो को ठेस पहुंच गई. फिर हमारे रास्ते अलग-अलग हो गए.
दूसरों की बीयर पी जाते थे धर्मेन्द्र 
1987 में आई फिल्म ‘आग ही आग’ की शूटिंग के दौरान एक दिन दोपहर में धर्मेन्द्र का बीयर पीने का मन किया. उन्होंने फिल्म की एक्ट्रेस मौशमी चैटर्जी को ग्लास में बियर डालकर लाने को कहा और साथ ही एक एक्स्ट्रा निर्देश दिया की उसमें झाग बनाकर लाना. तो मौशमी ने उनसे बंगाली एक्सेंट में पूछा, ”ए धर्मेन्द्र ये क्या पीता है?” मौशमी को पता होता था कि धर्मेन्द्र बीयर पी रहे थे. लेकिन वो जानबूझकर सबके सामने उनसे ये सवाल किया करतीं, ये देखने के लिए कि धर्मेन्द्र जवाब क्या देते हैं. मौशमी के सवाल पर धर्मेन्द्र ने कह दिया लस्सी ! तो मौशमी ने कह दिया, ”मुझे भी दे ना.” तब धर्मेन्द्र ने हारकर कह ही दिया, ‘हां, मैं बीयर पी रहा हूं.’                                                                                                              

                                                                                                                                                                                                बीयर का दूसरा किस्सा है फिल्म ‘शोले’ का. शोले के एक कैमरामैन थे जिम. जिम का दिन में 5-7 बीयर पीने का रूटीन था. धर्मेन्द्र ने बताया कि एक दिन वो जिम के पीछे बैठे थे. पास में जिम की बीयर पड़ी थी. तो उन्होंने भी कुछ सिप मार लिए. उसके बाद जिम ने बोतल उठाकर देखी तो उन्होंने सोचा कि मैंने तो इतनी पी नहीं, फिर बीयर गई कहां. ऐसा कई बार हुआ. जिम बेचारे पूछते फिरते ‘हाउ कम दिस इस पॉसिबल?’ लेकिन एक दिन धर्मेन्द्र की चोरी पकड़ी गई. जिम ने बस इतना कहा, ‘ओह! सो यू आर द वन हू ड्रिंक्स माय बियर.’

बिना फिल्म के डायरेक्टर को बताए स्टंट कर लिया था
फिल्मों में धर्मेन्द्र ने अपने कई स्टंट्स खुद किए. ‘शोले’ (1975) में धर्मेन्द्र घोड़े पर सवारी करते हुए दूसरे आदमी पर कूदे और उसे लेकर नीचे गिर गए. बताते हैं कि जब उस आदमी को लेकर वो गिर रहे थे, तो घोड़े के पैर उस आदमी पर आने वाले थे. तब धर्मेन्द्र ने अपना पूरा ज़ोर लगाकर घोड़े को खींचा जिससे घोड़ा एक तरफ गिरा और वो आदमी दूसरी तरफ.

स्टंट्स को लेकर धर्मेन्द्र का एक और दिलचस्प किस्सा है. उन्होंने राज खोसला की फिल्म ‘मेरा गांव मेरा देश’ (1971) में काम किया. राज खोसला फिल्म के कास्ट और क्रू की सुरक्षा को लेकर बहुत ही सजग रहते थे. इस बात से धर्मेन्द्र वाकिफ थे. लेकिन फिल्म का एक सीन करने का उनका बहुत मन था. इसमें उन्हें घोड़े से गिरना था. राज ये स्टंट किसी प्रोफेशनल से करवाने वाले थे. लेकिन धर्मेन्द्र ने फिल्म के एक्शन डायरेक्टर से सेटिंग करके इस सीन में खुद स्टंट करने की स्कीम बनाई. उन्होंने एक्शन डायरेक्टर को राज खोसला से ये बात छुपाने को कहा ताकि वो सीन बिना रोक-टोक हो जाए. ये सब धर्मेन्द्र अपने सीन को और नेचुरल बनाने के लिए कर रहे थे. जैसे ही उन्होंने वो स्टंट किया, वो घोड़े से खतरनाक तरीके से गिरे. इसे देख खोसला उठ खड़े हुए. तभी एक्शन डायरेक्टर उन्हें समझाया कि सर कोई बात नहीं, धर्मेन्द्र ये सीन खुद करना चाहते थे. वो ठीक हैं, उन्हें कुछ नहीं हुआ है.

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Milan Tomic

Hi. I’m Designer of Blog Magic. I’m CEO/Founder of ThemeXpose. I’m Creative Art Director, Web Designer, UI/UX Designer, Interaction Designer, Industrial Designer, Web Developer, Business Enthusiast, StartUp Enthusiast, Speaker, Writer and Photographer. Inspired to make things looks better.

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