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आतंक पर सर्जिकल स्ट्राइक करने वाले भारत की सुरक्षा के कर्णधार – एक IPS OFFICER ऑफिसर की कहानी

दुनिया में शायद ही ऐसा कोई होगा जो जेम्स बॉण्ड के नाम से वाक़िफ़ नहीं होगा। हमें याद है जब हम किसी बात को लेकर अधिक जिज्ञासा रखते थे तो कहा जाता था कि यार जेम्स बॉण्ड है क्या? कही न कही हम जेम्स बॉण्ड की कहानियों से प्रेरित तो थे, इसमें कोई शक नहीं है। और प्रेरित हो भी क्यूँ न, जेम्स बॉण्ड की देश के प्रति कर्तव्यनिष्ठा का भाव हमें प्रेरणा जो देता है और हमारे मन में देश के लिए कुछ कर गुजरने का भाव उत्पन्न करता है।

वास्तविकता में अगर ऐसे किरदार की तलाश हमारे देश में की जाए तो हमारी तलाश एक ही व्यक्ति पर आकर ठहर जाती है और वो व्यक्ति हैं श्री अजीत कुमार डोभाल। अजीत डोभाल एक ऐसा नाम है जिसे सुनते ही हर भारतीय का मन देशभक्ति से ओतप्रोत हो जाता है। कहा जाता है कि पर्वतीय लोग वीर और साहसी होते हैं, इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है इस बात का जीता जागता उदाहरण हैं उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल के घोड़ी बनेलस्यू गाँव में जन्मे अजित डोभाल। जो वर्तमान में भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के पद पर आसीन हैं। आज अजीत जिस महत्वपूर्ण पद पर हैं वहाँ तक पहुँच पाना कोई मामूली बात नहीं है। त्याग, निष्ठा और देशभक्ति की पराकाष्ठा ही रही होगी कि आज अजीत के हाथों में देश के सुरक्षा की बागडोर है।
                                                                                                                                                              प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार सुरक्षा और आतंकवाद से लड़ने के लिए एक नयी विचारधारा लेकर आई है। इस नवीन विचारधारा को प्रयोग में लाने का महत्वपूर्ण कार्य राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के जिम्मेदार कंधो पर है। प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा हो या देश के भीतर सुरक्षा और आतंकवाद को लेकर कोई बैठक उनमें डोभाल की उपस्थिति के बिना कुछ भी संभव नहीं है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक गलियारों में उनके विचारों को गंभीरता से लिया जाता है। इस गुप्तचर को न मीडिया में आने की इच्छा है ना नाम की चाह उन्हें तो बस देश की सुरक्षा की परवाह है।
आइये इस कड़ी में देश की शान अजीत डोभाल के जीवन पर प्रकाश डालते हैं। केरल कैडर के आइपीएस अफसर के रूप में डोभाल का पहला कार्यकाल 1968 में केरल के कोट्टायम में एएसपी के रूप में आरंभ हुआ। वो दौर केरल में राजनीतिक आंदोलनों का था और कोट्टायम में आंदोलनकारियों को अभिप्रेरित कर उन्हें रोकने में डोभाल सफल रहे थे। यही कारण था कि 1972 में आइबी के एक विशिष्ट ऑपरेशन के लिए जब कुछ सक्षम पुलिस अफसरों की जरूरत अनुभव हुई तो इस खुफिया एजेंसी ने केरल के दो अन्य आइपीएस अफसरों के साथ डोभाल का चयन किया। केरल सरकार ने आइबी के अनुरोध पर भी डोभाल को छोड़ने से इनकार कर दिया और उन्हें हासिल करने के लिए आईबी को खासी मशक्कत करनी पड़ी थी।
आइबी में अपने कार्यकाल के दौरान डोभाल ने मिजोरम जाने की इच्छा जाहिर की, जहां के विद्रोही नेता लालडेंगा द्वारा वहाँ अराजकता की स्थिति उत्पन्न कर दी गयी थी। अपने परिवार को दिल्ली में छोड़ कर वे चल पड़े 5 साल के अपने सफर पर मिजोरम की स्थिति सुधारने। साल 1986 में वे मिजोरम में फिल्ड एजेंट की भूमिका में थे। इस दौरान वहां उन्होंने मिज़ो नेशनल फ्रंट बना कर भारत सरकार के खिलाफ़ हथियार उठा चुके लड़ाकों को समझा–बुझा कर और कुछ को बल पूर्वक हथियार छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया था। उन्होंने मिज़ो फाइटर को शांति मार्ग पर चलने हेतु प्रेरित किया और इस प्रकार 20 सालों से चली आ रही अंतर्कलह व विरोध का अंत हो गया। अंततः लालडेंगा ने शांति समझौते पर दस्तखत कर दिये और एमएनए को मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) का नया नाम दिया गया। तब से ही मिजोरम लगातार पूर्वोत्तर का सबसे शांतिप्रिय राज्य बना हुआ है। इसी सफलता के फलस्वरूप इंदिरा गांधी सरकार द्वारा उन्हें पुलिस मेडल से नवाजा गया।
पाकिस्तान में 7 वर्षों तक ख़ूफिया जासूस की भूमिका में सीमा के उस पार रहकर सुरक्षा सूचनाएं उपलब्ध करवाना कोई हँसी मजाक का काम नहीं था, डोभाल जैसा जिम्मेदार व्यक्तित्व ही यह कार्य बखूबी कर सकता था। उनकी अगली नियुक्ति दिल्ली में हुई लेकिन जोखिम उठाने को तत्पर डोभाल को जल्दी ही प्रथम सचिव, वाणिज्य, के रूप में इस्लामाबाद के भारतीय उच्चायोग में भेज दिया गया। पाकिस्तान में अंडर कवर एजेंट की भूमिका के बाद वे इस्लामाबाद में स्थित इंडियन हाई कमीशन के लिए 6 वर्षों कार्य करते रहे। सन् 80 के दशकों में वे बतौर पाकिस्तानी एजेंट अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में दाखिल हुए थे और ख़ालिस्तान के लिए लड़ रहे लड़ाकों से अहम जानकारियां प्राप्त कर आए। कहा जाता है कि वे एक रिक्शा चालक के वेश में वहां दाखिल हुए थे और उनके द्वारा संचालित ऑपरेशन ब्लैक थंडर ने विद्रोहियों को आत्मसमर्पण करने पर विवश कर दिया था।
डोभाल ने कश्मीर के विरोधी ‘कूका परे’ और उसके साथी लड़ाकों को भी समझा-बुझा कर शांत करने का सफल कार्य किया। इनकी वजह से ही जम्मू कश्मीर में 1996 से सफल और अहिंसक चुनाव हो पा रहे हैं। क्या आपको कांधार में IC-814 का अपहरण याद है? इस पूरे प्रकरण में अपहृत लोगों को सुरक्षित वापस बुलाने में डोभाल की महत्वपूर्ण भूमिका और सूझ-बुझ को भला कौन भूल सकता है? साल 1971 से 1999 के बीच वे अपनी समझदारी और सतर्कता से 15 अपहरण के मामले सुलझा चुके हैं। इतना ही नहीं साल 2014 के जून माह में इस्लामिक स्टेट (IS) द्वारा बंधक बनाई गयी 46 भारतीय नर्सों को सुरक्षित भारत ले आये।
2005 में इंटेलिजेंस ब्यूरो (आइबी) के प्रमुख पद से रिटायर होने के बाद डोभाल ने “विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन” नामक एक थिंकटैंक की स्थापना की। जल्द ही उनके विचारों से प्रभावित होकर पेंसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी ने उन्हें विश्व के थिंकटैंकों में 20वां स्थान दिया। नौ वर्षों की अवधि में भारतीय विश्वविद्यालयों, विभिन्न संगठनों के मंचों पर उनके व्याख्यानों के दौरान सभा भवन श्रोताओं से भरे रहते थे। अपनी बुलंद आवाज में डोभाल लोगों को सहज ही इस निष्कर्ष तक पहुंचा देते कि –
“वक्त आ गया है, जब भारत को अपनी शांतिप्रियता की नीति छोड़कर दुश्मन का सीधा मुकाबला करने की नीति अपनानी चाहिए।”
उनके व्यख्यान आज भी बहुत लोकप्रिय हैं। अपने प्रशंसकों के लिए डोभाल एक जीवित व्यक्तित्व हैं, एक नायक हैं, जो अतुलनीय साहस के स्वामी होने के साथ ही भारत की सुरक्षा तथा रणनीतिक हितों पर अपनी सशक्त विचारधारा रखते हैं। डोभाल के कार्यों पर 47 वर्षों से नजर रख रहे उनके वरिष्ठ अधिकारी एवं पूर्व रॉ–प्रमुख एएस दुलत बताते हैं, “वह सर्वोच्च कोटि के खुफिया अफसर हैं, डोभाल को मिली वर्तमान शानदार सफलता की एक वजह सुरक्षा मामलों पर उनकी और मोदी की सोच का समान होना भी है।”
दुलत कहते हैं “मैं यह कहूंगा कि वाजपेयी और ब्रजेश मिश्र की जोड़ी अत्यंत उत्तम थी लेकिन मोदी तथा डोभाल की जोड़ी सर्वोत्तम है।”
सर्जिकल स्ट्राइक के जरिए दो बार पाकिस्तान को दिया गया करार जवाब हो या विदेश नीति भारत की आंतरिक सुरक्षा से संबंधित मामलों में मोदी के प्रमुख फैसलों पर डोभाल की स्पष्ट छाप देखी जा सकती है। आज डोभाल के सशक्त कंधों पर भारत देश स्वयं को धन्य अनुभव कर रहा है। प्रत्येक भारतीय उनके निर्णय और उनकी सोच को सलाम करता है और आतंक को चेतावनी देता है कि
“लहरों का शांत देखकर यह मत समझना, कि समंदर में रवानी नहीं है,
जब भी उठेंगे तूफ़ान बनकर उठेंगे, अभी उठने की ठानी नहीं है ||”
साल 2014 के संसदीय चुनावों में विदेशों में जमा कालेधन के मुद्दे पर भाजपा द्वारा प्रकाशित श्वेतपत्र भी डोभाल के शोधों पर ही आधारित था। एम.के. नारायणन के बाद डोभाल ऐसे दूसरे आइपीएस अफसर है जो एनएसए प्रमुख के पद तक पहुंचे है जिसे साधारणतः भारतीय विदेश सेवा (आइएफएस) के अफसरों के लिए सुरक्षित माना जाता है। वे एक जासूस की तेज–तर्रारी के साथ ही एक राजनयिक के विदेशी अनुभव से भी परिपूर्ण है जिसका रूप केवल सर्जिकल स्ट्राइक के बाद ही उभर कर सामने आया है।
डोभाल के ही बैच के आइपीएस अफसर और आइबी के पूर्व–प्रमुख केएम सिंह बताते है कि “आइएफएस अफसरों के लिए एक कार्यकाल किसी पड़ोसी देश में तथा दूसरा किसी विकसित देश में व्यतीत करना आवश्यक होता है। डोभाल को न केवल दोनों ही अनुभव प्राप्त हैं बल्कि इस्लामाबाद में तो उन्होंने दोहरे कार्यकाल का चुनौतीपूर्ण अनुभव भी हासिल किया है। उन्हें पंजाब, मिजोरम तथा कश्मीर जैसे राज्य के प्रमुख विद्रोहियों से निबटने के प्रत्यक्ष अनुभव हासिल होने के कारण डोभाल के पास देश के सुरक्षा परिदृश्य में व्यापक समझ है।“
अजीत डोभाल न सिर्फ़ एक शातिर जासूस हैं बल्कि एक उम्दा रणनीतिकार भी हैं। वे कश्मीरी अलगाववादियों जैसे यासिन मलिक, शब्बीर शाह के मध्य भी उतने ही लोकप्रिय हैं जितने भारत के वरिष्ठ अधिकारियों के मध्य। डोभाल को यदि राष्ट्रिय सुरक्षा के विषय का मनोवैज्ञानिक कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नही होगी। देश में शांति के दौरान सैन्य अधिकारियों को दिया जाने वाला सम्मान “कीर्ति चक्र” प्राप्त करने वाले अजीत डोभाल पहले पुलिस अधिकारी हैं।

आज पाकिस्तान को अपने नापाक इरादों से बाज़ आ जाना चाहिए क्योंकि डोभाल जैसे तेज-तर्रार ऑफिसर ने उन्हें सर्जिकल स्ट्राइक जैसा उदाहरण देकर ये साफ़ कर दिया है कि भारत अपनी आन, बान और शान के लिए कठोर से कठोर निर्णय ले सकता है।                                                                                                                               

                                                                                                                                                                                     यह आर्टिकल GAURAV SINGH द्वारा लिखा गया है

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Milan Tomic

Hi. I’m Designer of Blog Magic. I’m CEO/Founder of ThemeXpose. I’m Creative Art Director, Web Designer, UI/UX Designer, Interaction Designer, Industrial Designer, Web Developer, Business Enthusiast, StartUp Enthusiast, Speaker, Writer and Photographer. Inspired to make things looks better.

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