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आपके बरामदे में जलता बल्ब समंदर के एक कछुए की जान ले सकता है

आग जलाना सीखकर इंसान ने अंधेरे को हरा दिया था. ऐसा करके इंसान कुदरत के साथ-साथ अपने डर से भी जीत गया था – अज्ञात का डर. वो डर जो हमारे मूल स्वभाव का हिस्सा है. इसीलिए इतनी सदियां बीत गईं, हमारा अंधेरे का डर नहीं गया. इसीलिए एडिसन का बल्ब इतना महान आविष्कार माना जाता है. हम हमेशा उजाले में रहना चाहते हैं. रात में सोते हुए अपने कमरे में अंधेरा करते हैं, लेकिन कमरे के इर्द-गिर्द उजाला चाहते हैं. घर के बाहर तो पक्के तौर पर. लेकिन हरदम उजाले की इस ज़िद का एक अनचाहा नतीजा भी है – लाइट पॉल्यूशन.

जैसे वातावरण में ज़रूरत से ज़्यादा कार्बन डाई ऑक्साइड या सल्फर को एयर पॉल्यूशन माना जाता है, वैसे ही ज़रूरत से ज़्यादा रोशनी का होना लाइट पॉल्यूशन माना जाता है. दिन में सूरज होता है, तो ऑब्वियसली  हम यहां रात की बात कर रहे हैं.                                                                                                                                         
          पहले ये बता दें कि आज अचानक हमें लाइट पॉल्यूशन की क्यों सूझ पड़ी. वो ऐसा है कि आज 11वां ‘वर्ल्ड अर्थ आर’ है. आर का मतलब यहां घंटे से हैं. हर साल आज के दिन दुनियाभर में रात 8.30 से 9.30 तक लाइट बंद की जाती हैं. पर्यावरण को बचाने का संदेश देने के लिए. संदेश ये कि बिजली बचाएं. ताकि उसे बनाने में होने वाला प्रदूषण कम हो. 2007 में एक छोटी सी मुहिम के तौर पर शुरू हुए अर्थ आर को अब दुनियाभर में 7000 से ज़्यादा शहर मनाते हैं. इसे वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर (WWF) आयोजित कराता है, और कहते हैं कि ये पर्यावरण से जुड़ी दुनिया की सबसे बड़ी मुहिम है. यहां हमने इस साल के अर्थ आर के दौरान सिडनी की तस्वीरें दी हैं. उनमें आपको रोशनी का फर्क नज़र आएगा.
                                                                                          लाइट से भी पॉल्यूशन होता है??
अर्थ आर के दौरान हमारे शहर एक घंटे के लिए कुदरत के कुछ करीब पहुंच जाते हैं. माने जैसा उन्हें रात के वक्त होना चाहिए था, उसके कुछ करीब. वर्ना हमने रातों को लगभग मिटा दिया है. आप खुद याद करके देखिए. पिछली बार कब आपने बिलकुल अंधेरे वाली किसी जगह से आसमान को ताका था? हो ये गया है कि हम रात में कहीं से भी आसमान को देखें, एक धुंधलापन नज़र आता है. तारे कम-कम नज़र आते हैं. ऐसा लगता है कि रात में भी कहीं से आकर रोशनी आसमान में भर गई है. यही अनचाही रोशनी लाइट पॉल्यूशन है.

दूसरे तरह के पॉल्यूशन की ही तरह लाइट पॉल्यूशन भी एक जगह टिक कर नहीं रहता. रोशनी हवा के कणों से टकराकर फैलती है जिसे अंग्रेज़ी में लाइट स्कैटरिंग कहते हैं. तो किसी एक जगह हो रही तेज़ रोशनी की दमक आसमान में पसर जाती है, आसपास के इलाकों से नज़र आती है. दिल्ली जैस बड़े शहरों से पैदा होने वाली रोशनी 100 किलोमीटर से भी आगे तक जाती है.
                                                                                              

क्या नुकसान होता है लाइट पॉल्यूशन से?

लाइट पॉल्यूशन को देर से समझा गया. लोगों में इसे लेकर जागरुकता भी कम है. लेकिन अब इसके कई नुकसान सामने आ रहे हैंः
# हमारे अंदर भी एक घड़ी होती है, जिसके मुताबिक हमारा दिमाग ये तय करता है कि कब जागना-सोना है. इसे सर्केडियन रिदम कहते हैं. सर्केडियन रिदम दिन और रात के हिसाब से सेट रहती है. ज़्यादा वक्त तक आर्टिफिशयल लाइट (जो लाइट पॉल्यूशन का नतीजा हो सकती है) के सामने रहने से ये रिदम गड़बड़ा जाती है. तो हमारे सोने जागने का क्रम बिगड़ जाता है.
# बात सोने-जागने पर ही नहीं रुकती. सर्केडियन रिदम के हिसाब से हमारे शरीर में मेलाटॉनिन हॉर्मोन पैदा होता है. ये हमें सो पाने में तो मदद करता ही है, साथ ही एक रिफ्रेशनर का काम भी करता है. इम्यून सिस्टम के साथ-साथ कॉलेस्ट्राल और थायराइड लेवल पर भी इसका असर रहता है. आर्टिफिशयल लाइट से मेलाटॉनिन की पैदावार कम होती है. तो शरीर में स्ट्रेस बढ़ता है और बीमार पड़ने की संभावना बढ़ती है.
# आसमान में बेज़ रोशनी से प्रवासी पक्षियों (माईग्रेटरी बर्ड्स) को बड़ी मुश्किल होती है. कई बार ये रास्ता भटक जाते हैं.
# लाइट स्कैटरिंग के चलते उन इलाकों में भी रोशनी बढ़ जाती है जहां दूर-दूर तक इंसान नहीं होता. इसे स्काय ग्लोकहते हैं. इससे जंगल में रहने वाले उन जानवरों को खासी दिक्कत होती है जो रात में निकलते हैं (निशाचर).
                                                                                              # कछुए जब अंडों से निकलते हैं, तो समंदर को वो उसकी चमक से पहचानते हैं और उसकी ओर बढ़ते हैं. लेकिन शहरों से पैदा होने वाली चमक उन्हें भटका देती है. इससे वे समंदर से उलटी दिशा में चले जाते हैं, और मारे जाते हैं.
# खगोलशास्त्री (एस्ट्रोनॉमर) आसमान में घूर-घूर कर नए तारों और ग्रहों का पता लगाते हैं. उनपर शोध करते हैं. दूर ब्रह्मांड से आने वाली मद्धिम रोशनी इन्हें देखने का अकेला ज़रिया है. आसमान में ज़रूरत से ज़्यादा रोशनी होने पर ये नज़र नहीं आते. तो शोध के काम पर असर पड़ता है.

तो अब इसे रोकने के लिए क्या कर सकते हैं?

जैसे-जैसे दुनियाभर में बिजली पहुंच रही है, लाइट पॉल्यूशन भी बढ़ रहा है.  इसकी ज़द में  पहले से ज़्यादा लोग आ रहे हैं. अमेरिका और यूरोप में तो समस्या इतनी बढ़ गई है कि वहां की 99 फीसदी आबादी कुदरती तौर पर रात का अंधेरा अनुभव कर ही नहीं पाती. तो कुछ करना ज़रूरी है. लेकिन क्या. दो-तीन उपाय ये रहेः
                                                                                         # सबसे ज़्यादा लाइट पॉल्यूशन फैलता है स्ट्रीट लाइट के चलते. स्ट्रीट लाइट जलाना बंद नहीं किया जा सकता. लेकिन उनका डिज़ाइन इस तरह का रखा जा सकता है कि ज़्यादा से ज़्यादा रोशनी सीधे सड़क पर पड़े.
# मंहगी इमारतों में रात में बाहर से रोशनी की जाती है. ताकि वे रात में दूर से दिखें. इसपर लगाम लगाने की ज़रूरत है.
# तीज-त्योहार पर आजकल खूब रोशनी की जाती है. कई दिनों तक घरों-सड़कों पर सीरीज़ लगा कर रखी जाती है. इसे कुछ कम किया जा सकता है
# आखिर में सबसे कारगर और सबसे आसान तरीका. वो ये कि आपको जब और जहां ऐसा कोई लाइट जलता दिख जाए जिसे बंद किया जा सकता है, तो स्विच दबाने में कोताही न करें. लाइट पॉल्यूशन कम होगा, और बिजली का बिल कम आएगा, वो अलग.

BY GAURAV SINGH 



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Milan Tomic

Hi. I’m Designer of Blog Magic. I’m CEO/Founder of ThemeXpose. I’m Creative Art Director, Web Designer, UI/UX Designer, Interaction Designer, Industrial Designer, Web Developer, Business Enthusiast, StartUp Enthusiast, Speaker, Writer and Photographer. Inspired to make things looks better.

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